हमारे सामाजिक, राजनीतिक, धर्म के उच्चतम नैतिक, और नागरिक जीवन में धर्म के महत्व की व्याख्या कीजिए – Sab Sikho

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आज इस पोस्ट के माध्यम से हम जानेंगे कि हमारे सामाजिक, राजनीतिक, धर्म के उच्चतम नैतिक और नागरिक जीवन में धर्म के महत्व के बारे में जो निम्नलिखित हैं जिस पर विस्तार से चर्चा की गई है, इसे अंत तक जरूर पढ़ें।

हमारे सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक जीवन में धर्म के महत्व – धर्म की धारणा

हमारे सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक जीवन में धर्म के महत्व

सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक जीवन में धर्म का महत्व- धर्म का सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक जीवन में बहुत अधिक महत्व है जो निम्नलिखित दृष्टिकोण से है-

(1) महाभारत के शान्तिपर्व एवं अनुशासन पर्व के अनुसार धर्म एक नैतिक कर्म है इसलिए व्यक्ति को अपने उद्देश्यों एवं इरादों का उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए।

(ii) मनु संहिता के अनुसार धर्म का संबंध उच्च सद्गुणों एवं आध्यात्मिक प्रयासों से है।

(iii) धर्म का संबंध व्यक्तियों के सामान्य व्यवहार, जीवन की सुरक्षा एवं व्यक्तिगत रूचिया यथा-स्वच्छता, सफाई का प्रबंध, नागरिक चेतना, अच्छा व्यवहार शिष्टता एवं भद्र तरीकों से होता है।

(iv) धर्म भिन्न-भिन्न ढंग से निरूपित किया जाता है। इसका आधार विभिन्न वर्ग जीवन एवं प्रतिष्ठा के विभिन्न स्तर होते हैं। यह पुरुष तथा महिलाओं के लिए भी अलग हो सकता है।

(v) धर्म एक प्रकार से एक-दूसरे से सम्बंधित कर्तव्यों का जाल होता है और इसे व्यक्तियों द्वारा निर्धारित किया जाता है।

(vi) धर्म के आधार पर ही समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है। यथा ब्राह्मण वर्ण का धर्म अध्ययन, अध्यापन एवं पूजापाठ आदि था।

(vii) धर्म को समय एवं युग के संदर्भ में समझा जा सकता है और क्रियान्वित किया जा सकता है।

(vii) धर्म से ही आध्यात्मिक उद्देश्य उत्पन्न होते हैं जिनका सामाजिक एवं नागरिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

(ix) प्रत्येक व्यक्ति का धर्म जीवन के चार लक्ष्यों-धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष से सम्बंधित है। इसमें धर्म सर्वोच्च है, क्योंकि यह सभी के हितों में हमारी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इस प्रकार धर्म का सामाजिक, राजनीतिक और नागरिक जीवन में बहुत अधिक महत्व है।

धर्म की प्राचीन भारतीय अवधारणा की व्याख्या

धर्म की प्राचीन भारतीय अवधारणा-प्राचीन भारत में धर्म एक संयुक्त शब्द है जो चार वस्तुओं- सदाचार, कर्तव्य, विधि युक्त और औचित्यपूर्ण दायित्व से बना है। यहां धर्म का मूल विचार नैतिक कर्म है।

इस अवधारणा में इस बात पर बल दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति की स्वयं की प्रकृति एवं स्वभाव होता है और वह उसी के अनुसार आचरण करता है। महाभारत के शान्ति पर्व एवं अनुशासन पर्व में कहा गया है कि व्यक्ति को अपने उद्देश्यों एवं अपने इरादों का उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए।

गीता में श्रीकृष्ण ने धर्म को निष्काम कर्म के रूप में स्वीकार किया है। मनु संहिता में धर्म को न केवल वस्तुओं के गुणों एवं स्वाभाविक विशेषताओं से सम्बंधित माना गया है बल्कि इसका सम्बंध उच्च सद्गुणों एवं आध्यात्मिक प्रयासों से जोड़ा गया है।

क्या धर्म की धारणा अस्पष्ट आदर्शवादी है?

यह सर्वथा सही है कि धर्म की धारणा अस्पष्ट आदर्शवादी है। कोई व्यक्ति जो धारण या ग्रहण कर लेता है और निरंतर उसी प्रकार आचरण करता है, वह उसका धर्म बन जाता है। परन्तु यहां अच्छे कार्य या अच्छे गुणों पर जोर दिया जाता है अर्थात यह आदर्शवादी भावना है। चोर का धर्म चोरी करना है, परन्तु इसे धर्म के संदर्भ में व्यक्त नहीं किया जाता है।

करूणा दिखाना भी धर्म है, परंतु यह उच्च गुण है इसलिए इसको अधिक महत्व दिया जाता है। इसी प्रकार एक उदारवादी की दृष्टि में सम्पति का अधिकार अनिवार्य हो सकता है, लेकिन एक साम्यवादी का दृष्टिकोण ठीक इसके विपरीत हो सकता है। अहिंसा का सिद्धांत भी श्रेष्ठ है। कहा भी गया है “अहिंसा परमोधर्मो” ।

परन्तु अहिंसा कहीं उचित हो सकती है और कहीं अनुचित । युद्ध में अहिंसा अनुचित हो सकती है। इस प्रकार धर्म अस्पष्ट आदर्शवादी है। महर्षि मारकण्डेय का कथन है, “सदाचार के मार्ग जटिल, कठिन, विविध एवं अनन्त हैं।’

धर्म के उच्चतम नैतिक, सामाजिक और नागरिक मूल्यों की व्याख्या

धर्म के उच्चतम नैतिक, सामाजिक और नागरिक मूल्यों की व्याख्या-

(i) प्रथम धर्म के उच्चतम नैतिक, सामाजिक एवं नागरिक मूल्य पंथ निरपेक्ष राज्य है जिसमें राज्य का अपना कोई पंथ नहीं होता। ये नागरिकों को बिना किसी पंथ, जाति, प्रजाति के आधार पर भेदभाव किये बिना सभी को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

(ii) भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता तथा कानून के समक्ष समानता का अधिकार मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है।

(iii) पंथ निरपेक्षता से आपसी भाईचारे को बढ़ावा मिलता है क्योंकि समाज के सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाते हैं और उनकी भावनाओं का आदर करते हैं। वस्तुतः भारत की सहनशीलता एक लम्बी परम्परा है।

(iv) प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में धर्म एक ‘संयुक्त शब्द’ है। इसमें सदाचार’ कर्तव्य, कानून और उचित दायित्व शामिल हैं।

(v) पाश्चात्य परम्परा में धर्म का सार कर्तव्य को माना गया है। भारतीय परम्परा के अनुसार इसमें चार वर्णों ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का दर्शन होता है।

निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें-

(क) पंथ निरपेक्षवाद।

(ख) मेरा लक्ष्य और कर्त्तव्य।

(ग) चतुर्वर्ण आश्रम।

(क) पंथ निरपेक्षवाद-पंथ निरपेक्षवाद बह विचारधारा है जिसमें राज्य का अपना कोई पंथ नहीं होता। नागरिकों को बिना किसी पंथ, जाति, प्रजाति के आधार पर भेदभाव किये बिना सुरक्षा प्राप्त होती है। पंथ निरपेक्षवाद एक धनात्मक विचारधारा है और इससे भाईचारा का वातावरण बनता है।

(ख) मेरा लक्ष्य और कर्त्तव्य-यह पाश्चात्य परम्परा में धर्म का सार है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने लक्ष्य के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करना चाहिए। भारतीय परंपरा के अनुसार ये चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- का दर्शन है।

(ग) चतुर्वर्ण आश्रम-भारतीय धर्म में एक महत्वपूर्ण विशेषता चतुर्वर्ण आश्रम है जिसका उल्लेख वेद एवं स्मृतियों में मिलता है। वैदिक काल में मानव समाज को कर्म के आधार पर चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में और मानव जीवन को चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, सन्यास और वानप्रस्थं में विभाजित किया गया है। चतुर्वर्ण आश्रम व्यवस्था में कर्म को धर्म के रूप में स्वीकार किया गया।

मुझे उम्मीद है कि आप लोगों को आज के इस पोस्ट में जो मैंने विस्तार से चर्चा की है जैसे हमारे सामाजिक, राजनीतिक, धर्म के उच्चतम नैतिक और नागरिक जीवन के बारे में, अगर आप लोगों को यह पोस्ट अच्छा लगा तो शेयर जरूर करें और हमें कमेंट में भी बताएं और नीचे दिए गए कुछ लिंक हैं जिन्हें आप क्लिक करके और भी पोस्ट को पढ़ सकते हैं, बहुत-बहुत धन्यवाद।

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