न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का वर्णन कीजिए तथा न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोणों में क्या अन्तर है – Sab Sikho

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आज की इस पोस्ट में न्याय की अवधारणा के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है और साथ ही साथ न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोण में क्या अंतर है इसके बारे में विस्तार से चर्चा की गई है जो निम्नलिखित है।

न्याय की अवधारणा के रूपों का वर्णन – न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोणों में अन्तर

न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का निम्न वर्णन

न्याय की धारणा के विविध रूप (Various forms of Concept of Justice) न्याय की धारणा के विविध रूप निम्न प्रकार हैं-

1. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice)- समाज में व्यवस्था तभी बनी रहेगी यदि व्यक्तियों को स्वतंत्रता और समानता प्रदान की जाए। परन्तु यह अव्यावहारिक है। प्राकृतिक स्वतंत्रता व्यवस्थित समाज के अस्तित्व में आने से पहले की कल्पना हो सकती है।

2. नैतिक न्याय (Moral Justice)- पारंपरिक रूप से न्याय की नैतिक विचार को ही अपनाया जा रहा है। नैतिक न्याय (सत्यता) के प्रमुख नियमों में जो आदर्श सम्मिलित हैं, उनमें सत्य बोलना, प्राणिमात्र के प्रति दया का व्यवहार करना, परस्पर प्रेम करना, प्रतिज्ञा पूरी करना, वचन का पालन करना, उदारता व दान का परिचय देना आदि हैं।

3. राजनीतिक न्याय (Political Justice)- अरस्तु ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बंधी (Distributive) न्याय बताया था, जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था।

आधुनिक युग में राजनीतिक समाज के सदस्य होने के नाते व्यक्ति द्वारा उसकी योग्यता के अनुसार शासन में भाग लेने, उसके सम्बन्ध में मत व्यक्त करने, चुनाव में अपना मत देने, चुनाव में स्वयं खड़े होने तथा राजकीय पद ग्रहण करने आदि के अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए तथा निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को ही राजनीतिक न्याय कहते हैं। लोकतंत्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय अत्यंत आवश्यक है।

4. सामाजिक न्याय (Social Justice)- सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्व है। समाज में जाति, धर्म, वर्ग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। दास प्रथा के समय दासों को अन्य नागरिकों से हेय समझा जाता था।

भारत में बहुत समय तक अछूतों को समाज का हेय अंग समझा जाता था। संसार के अनेक भागों में अब भी समाज में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान नहीं है। ये सब सामाजिक अन्याय की स्थितियाँ हैं। सामाजिक न्याय की स्थिति में सबको समाज में उचित स्थान प्राप्त होता है।

5. आर्थिक न्याय (Economic Justice)- आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन के साधन और सम्पति के वितरण की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सबको उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके तथा कोई व्यक्ति, समुदाय या वर्ग किसी अन्य व्यक्ति समुदाय या वर्ग का शोषण न कर सके।

सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। आधुनिक युग में आर्थिक न्याय का बड़ा महत्व है। आर्थिक विषमता होने पर समाज धनी और निर्धन, पूँजीपति और श्रमिक एवं शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित हो जाता है। जिस कारण समाज उन्नति नहीं कर सकता।

6. कानूनी न्याय (Legal Justice)- कानूनी न्याय से अभिप्राय है कि कानून न्याय-संगत हो, समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हों। किसी भी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त न हों। कानून जनता द्वारा समय-समय पर परखा जाए। न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो ताकि निर्धन व्यक्ति भी धन के अभाव में कहीं न्याय से वंचित न रहें और धनी वर्ग के शोषण का शिकार न हो जाएं।

न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोणों में अन्तर

न्याय की व्याख्या सरल नहीं है। यह एक जटिल अवधारणा है। कभी इसका कानूनी रूप में प्रयोग किया जाता है तो कभी नैतिक रूप में। न्याय की अवधारणा का उद्देश्य सम्पूर्ण समाज का कल्याण करना भी होता है। कुछ लोगों की मान्यता है कि न्याय का अर्थ यथास्थिति बनाए रखना है।

उदारवादी दृष्टिकोण (Liberal view)- न्याय का उदारवादी दृष्टिकोण न्याय का ऐसा दृष्टिकोण है जो सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन में व्याप्त अन्याय की समाप्ति चाहता है। इस दृष्टि से उदारवादी जब न्याय की बात करते हैं तो वे लोगों को रोजगार, बीमारी के विरुद्ध बीमा तथा वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहयाता देने का पक्ष लेते हैं।

न्याय के समर्थक उदारवादी-कल्याणकारी राज्य की कल्पना करते हैं। उदारवादी न्यायिक असन्तुलन को तो समाप्त करना चाहते हैं, परन्तु वे समाजवाद के पक्ष में नहीं हैं।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist view)- न्याय के मार्क्सवादी दृष्टिकोण में प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार काम दिये जाने की व्यवस्था की गयी है। साम्यवादी कहते हैं कि न्याय का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार भुगतान देना है।

इसका भाव यह है कि मार्क्सवादियों के अनुसार सामाजिक भार लोगों की क्षमताओं के अनुरूप वितरित हो तथा लाभ आवश्यकताओं के अनुसार वितरित होना चाहिए। न्याय का साम्यवादी दृष्टिकोण समाजवादी व्यवस्था चाहता है, लोक कल्याणकारी व्यवस्था नहीं ।

संक्षेप में न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोणों का अन्तर निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है।

उदारवादी दृष्टिकोण (Liberal view)मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist view)
1. उदारवादी दृष्टिकोण न्याय में लोक कल्याणकारिता पर बल देता है।1. मार्क्सवादी दृष्टिकोण न्याय की समाजवादी व्यवस्था पर बल देता है।
2. उदारवादी सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक जीवन में असंतुलन की समाप्ति चाहते हैं।2. मार्क्सवादी न्याय में समाजवाद के तथ्य को स्वीकार करते हैं।
3. उदारवादी न्याय के राजनीतिक पहलू पर जोर देते हैं।3. मार्क्सवादी न्याय के सामाजिक एवं आर्थिक पहलू पर बल देते हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में न्याय की अवधारणा का वर्णन

हिन्दू धर्म की स्मृतियों के अनुसार कानून धर्म की एक शाखा है। विभिन्न स्मृतियां धर्म के नियमों के अनुसार ही न्याय व्यवस्था को निश्चित करती हैं। स्मृतियों के अनुसार दण्ड की व्यवस्था को निश्चित करती है। स्मृतियों के अनुसार दण्ड की व्यवस्था न्याय से सम्बंधित है। इनके अनुसार राजा को दैवीय गुणों के अनुसार कार्य करना चाहिए।

जो भी प्राणी अपने स्वधर्म का पालन नहीं करता था उसे धर्म के नियमों के अनुसार दण्डित किया जाता था। मनुस्मृति में फौजदारी और दीवानी कानूनों से सम्बंधित धर्म-कर्त्तव्यों के उल्लंघन के लिए कानून विधि, दण्ड विधि की व्यवस्था की गई है। मनु ने अपराध के अनुपात के के अनुसार दण्ड- ब फटकार लगाना, जुर्माना करना, बनवास देना तथा मृत्यु दण्ड का विधान किया है।

परन्तु यह दण्ड वर्णमूताक व्यवस्था के अनुसार दण्ड का विधान किया है। परन्तु यह दण्ड वर्णमूताक व्यवस्था के अनुसार समय, स्थान व उद्देश्य के आधार पर दिए जाते थे। समान अपराध पर जातिगत आधार पर असमान दण्ड की व्यवस्ता थी। ब्राह्नों को मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था, परन्तु भयंकर अपराध के लिए ब्राह्मण को मौत की सजा जल में डुबोकर मारने की थी।

जुआ खेलने वालों को कोड़ों की सजा दी जाती थी उत्तराधिकार कानून की सूक्ष्म व्यवस्था थी जिसमें बड़े भाई की सम्पत्ति के अलावा कुंआरी बहनों का भाग भी होता था। न्याय प्रशासन का उद्देश्य सुधारात्मक था। मनु ने चार प्रकार के दण्ड बताए- 1. वाक दण्ड 2. धिक दण्ड, 3. धन दण्ड 4. मृत्यु दण्ड ।

न्यायालयों के प्रकार चार श्रेणी के होते थे-

(i) राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी : सभा की अध्यक्षता राजा करता था। सभा में वेदों, धर्म-शास्त्रों और स्मृतियों के योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी ब्राह्मण सलाहकार होते थे।

(ii) पूग-पूग अथवा गण भिन्न जाति वालों के समूह को कहते थे। इनका अलग न्यायालय होता था।

(iii) श्रेणी : एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाला व्यक्ति समूह चाहे वे किसी भी जाति के क्यों न हों, श्रेणी कहलाते थे। उनके लिए अलग न्यायालय की व्यवस्था थी।

(iv) कुल चौथे प्रकार का न्यायालय था इसमें जाति विशेष के बंधु-बान्धव होते हैं। मनुस्मृति में यह भी बताया गया है कि न्यायकर्ताओं की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए।

न्यायालयों के संगठन में सबसे नीचे की इकाई एक ग्राम तक ही सीमित थी। इसका न्यायिक अधिकारी ग्रामिक कहलाता था। इसके ऊपर दस ग्राम के तथा उसके बाद 20 ग्रामों के अधिपति के पास विवाद भेजा जाता था। उसके बाद अति, सहस्रधिपति के पास विवाद भेज दिया जाता था।

आज के इस पोस्ट में जो मैंने न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का वर्णन किया है और साथ ही साथ न्याय के उदारवादी व मार्क्सवादी दृष्टिकोण में क्या अंतर है यह बताया गया है। उम्मीद करता हूं कि आप लोगों को यह पोस्ट बहुत ही अच्छा लगा होगा तो इसे जरूर शेयर करें और भी इसी तरह के पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं, बहुत-बहुत धन्यवाद।

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